Life Style - Apna Pratapgarh

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Life Style

संस्कृति

प्राकृतिक सुंदरता से आच्छदित प्रतापगढ़ जिला निम्न क्षेत्र बांसवाड़ा, चित्तौड़गढ़, नीमच, रतलाम और मंदसौर जिलों से मिला हुवा हैं। यहाँ  वागड़, मालवा और मेवाड़ की संस्कृति का संगम हैं। यहां की आदिवासी संस्कृति और परंपरा पर न केवल राजस्थान, बल्कि मध्यप्रदेश की भाषा, वेशभूषा, बोलियों और संस्कृति की भी छाप हैं।

आदिवासी मीणा

हालाँकि प्रतापगढ़ में सभी धर्मों, मतों, विश्वासों और जातियों के लोग निवास करते हैं, पर यहाँ की जनसँख्या का मुख्य घटक मीणा  आदिवासी हैं, जो राज्य में 'अनुसूचित जनजाति' के रूप में वर्गीकृत हैं। 

पीपल खुंट उपखंड में, 40 प्रतिशत से अधिक आबादी मीणा जनजाति की हैं। जिनके  परिवार मूल रूप से कृषि, मजदूरी, पशुपालन और वन उपज पर निर्भर हैं और जिनकी अपनी ही अलग संस्कृति, बोली और वेशभूषा हैं। अन्य जातियां भी यहां है और सिख-सरदारों की संख्या यहाँ  नगण्य हैं। 

लोक संस्कृति

यहां रीति-रिवाज, लोकगीत, लोक नृत्य और शादी की रस्मो  के तोर तरिके भी अलग हैं। लेकिन तेजी से बढ़ रहे शहरीकरण के प्रभाव से आदिवासी परंपराओं पर भी प्रभाव पड़ा हैं।

मौताणा - यहां की एक विचित्र विशिष्ट परम्परा है- मौताणा : जो पूरे उदयपुर संभाग में, खास तौर पर आदिवासी बाहुल्य जिलों-प्रतापगढ़, डूंगरपुर और बांसवाडा में बहुप्रचलित हैं।

आदिवासी आवास

यहाँ कच्चे मकान या झोंपडियां पहाड़ की ऊंचाई पर बनाने का रिवाज़ है ताकि नीचे से ऊपर की तरफ़ आते अजनबियों को दूर से ही देखा जा सके। आगंतुक मेहमानों का ढोल बजा कर स्वागत करने और उन्हें साफा बांधने की रस्म भी यहां पुरानी हैं ।
मकान कच्चे और केलू वाले होते  हैं, जो घास, बांस, अधपकी ईंटों, काली मिट्टी और लकड़ी से बनाये जाते हैं।

वेशभूषा और गहने

ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं की मुख्य पोशाक सूती घाघरा, मुद्रित गहरे लाल-भूरे रंग की पोशाक और ब्लाउज हैं, गहने आमतौर पर चांदी के होते हैं। शादी में भी यथाशक्ति चांदी ही भेंट में दी जाती है। औरतें पाँव, हाथ, गर्दन, कान और सिर पर विभिन्न तरह के गहने धारण करती हैं।

महिलाओं के सिर पर 'बोर' या 'बोरेला', पैरों में 'कड़ी', बाहों में 'बाजूबंद', बालों में 'लड़ी-झुमका', उँगलियों में अंगूठियां और नाक में 'नथ' या 'लोंग' धारण करती हैं।

पुरुष अक्सर साफा, पग (पगड़ी) धोती और सूती शर्ट या अंगरखा-कुर्ता पहनते हैं, लेकिन वे शरीर पर कोई विशेष आभूषण नहीं पहनते हैं।

कुछ विशेष जातियों में 'मोरकी' निश्चित रूप से पुरुषों के कानों में दिखाई देती है। बोहरा मुस्लिम सामान्यतः सिर पर टोपी (क्रोशिये से बुनी कलापूर्ण) लगाते हैं।

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