सोशल डिस्टेंसिंग के दौर में भावनात्मक डिस्टेंसिंग ना रखें - ललित शर्मा - Apna Pratapgarh

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Thursday, July 2, 2020

सोशल डिस्टेंसिंग के दौर में भावनात्मक डिस्टेंसिंग ना रखें - ललित शर्मा

सोशल मीडिया फेसबुक, Whatsaap,  इंस्टाग्राम आदी की Virtual लाइम लाइट, चकाचौंध में जो जितना ज्यादा भीड़ में वह उतना ज्यादा अकेला होता है । ऐसा मेरा मानना है हो सकता है आपका विचार और अनुभव इससे अलग भी हो परन्तु ये सच्चाई है की ये Virtual दुनिया दिखावा और काल्पनिक अधिक है।

हम  इससे वास्तिक रिश्तो और लोगो से भावनात्मक रूप से दुर होते जा रहे है । लोग परेशान हो जाते है संघर्ष करते करते पर हिम्मत नहीं हारते। स्ट्रांग बनिये, इस Virtual वर्ल्ड से बाहर निकलिए औरों के लिए न सही अपने लिए अपने हीरो बनिये । आईने में देख कर फील होना चाहिये आने दे जो भी संकट आये, देख लेंगे, लड़ लेंगे जो होगा वो अच्छा ही होगा की सोच के साथ अच्छे और नेक कर्म करते जाये ।

जितना हो सके उतनी खुले दिल से और बिना दिखावे के लोगो की मदद किजीये, अच्छे बनने का दिखावा नही वास्तव मे अच्छा बनना ही मानवता है ।

सोशल डिस्टेंसिंग के इस दौर में इमोशनल डिस्टेंसिंग को हावी मत होने दीजिए। अपने दोस्तों से बात करिए। अपने परिवार के साथ वक़्त बिताए। अपने सहयोगियों को सहयोग किजीए ।अपने पडोसियों  के साथ शान्ती से रहिये। हो सकता है किसी को आपकी ज़रूरत हो। शायद आप किसी की कुछ मदद कर सकें। एक दूसरे से दूर भले रहे पर एक दूसरे से बातचीत मत छोड़ें, पता नहीं कौन किस मानसिक स्थिति से गुजर रहा हो और आपके एक फोन काँल से उसे मानसिक शन्ति मिल जाए? हर रोज किसी अपने जान पहचान के किसी भी व्यक्ति से फोन पर बात करें । चर्चा किजीए अपनी समस्या पर, देश के मुद्दो पर, अपनी स्किल्स के डेवलपमेंट पर या फिर किसी के Knowledge को Update करने में।

किसी अपने से बात किजीये।।

दिखावा या झूँठ कुछ समय की सहानुभूति के अतिरिक्त और कुछ प्रदान नहीं कर सकता जबकि सच्चाई सत्य आपको सब कुछ दे सकता है..झूँठ बोलकर या किसी को धोखा देकर कुछ सिद्ध नहीं कर सकते...पर लोगो की मदद करके , उनको सही रास्ता दिखाकर  कम से कम ये तो सिद्ध किया ही जा सकता है  की मानवता अभी भी है मेरे मित्र !! सच्चे,अच्छे और नेक लोगो की अभी कोई कमी नही हुई है। कब किसके मन में क्या चलता है कोई नहीं जानता, हमारा लक्ष्य यही होना चाहिए कि कभी भी किसी को बुरा भला ना कहें, जितना हो सके आपस में प्रेम और सद्भाव रखें।

हर सुखद एहसास किसी सच्चाई के साथ ही आता है  खुद की अट्टहास की ध्वनी हमें नींद से जगाती हैं और फिर हम निकलते हैं अपनी राहों पर, नए उन्मादों के साथ सफर कम बोझिल लगने लगता है। निकलिए बदलाव के इस दौर मे एक हीरो के रूप मे, लोगो की भलाई का सपना लीये - Be a  HERO ,our world need more HEROES के स्लोगन के साथ । 

जब हम नई उम्मिद के साथ निकलते है तो  ऋतुएं रंगीन लगती हैं । रास्ते lushgreen होते है। मौसम बारिश जैसा फील होता है  तब हम इंद्रधनुष देख कर खूश होते हैं ,आंखे बन्द कर के महसूस करने की झूठी कोशिश नहीं करते है। तब हमें पता होता हैं लॉज् ऑफ ड़िफ्रेक्सन । तब कुछ एहसास होता है तो वो यह है कि " काश " और " हमेशा " के बीच अगर कुछ सच है तो वो है " एक्जिस्टेंस" और वही है " जीवन " इतना महसूस होते ही हम खुद को उड़ता हुआ पाते हैं, हम बन जाते हैं सुपर हीरो।

बुने हुए बातूनी सपनों को खोल देते हैं और लग जाते हैं कर्म करने में। फिर अपनी सुपर पावर से बचाने की कोशिश करते हैं, सबसे पहले खुद को और फिर औरो को जीये.........नई उम्मिद, नये सपनो के साथ ।

           Heros are never born. They just only reborn. And then resuscitate too.

       ललित शर्मा
      Motivational Speaker and Writer
     प्रतापगढ़
Distancing - Social and Emotional

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