बारिश का मौसम और चाय वाला इश्क़ । - Apna Pratapgarh

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Saturday, June 20, 2020

बारिश का मौसम और चाय वाला इश्क़ ।

मैं चाय की उतना ही शौकीन हूँ जितना प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी करने वाला current  GK की बुक का होता है  या  उतना जितना कोई भक्त प्रभु दर्शन का होता है। मे  चाय  का उतनी है तलब है जितना किसी  pugb  लवर को revival होने की   होती  है मुझें चाय का इन्तज़ार उससे भी कही ज्यादा  होता है  जितना exam मे किसी स्टूडेंट को कही इधर उधर से किसी question का answer मिलने का होता है  । मेरे चाय वाले किस्से तो बहुत है। कुछ अपने, कुछ दोस्तों के साथ ।

जेसे जयपुर के GT रोड़ की वो mba वाली चाय या फिर कॉलेज की कैंटीन पर चाय तो सब पियेंगे  पर बिल  के लिए number  वाला गेम। या फिर घन्स्सू की वो चाय की दुकान  जहा चाय पिते  पिते ही पता ही नही चला और कब RPSC का exam clear हो गया। पर इस बार अपना किस्सा सुनाता हूं । मेरे शहर की बारिश जो काम पर जाने के वक़्त ही अक्सर  आती हैं। ऐसे ही किसी एक दिन बारिश आई और न हमारे पास छाता न रेन कोट फिर भी हम निकल पड़े  काम पर जाने के लिए । काम पर जाना भी जरूरी था और नई नौकरी का जोश भी था । भगवान का नाम लिया निकल पड़े।

शहर की तंग गलियों की ख़ासियत है कि गली सिर्फ गीली होती है, पानी जमता है लेकिन बारिश सीधी नही गिरती आप पर जब तक आप बस स्टॉप न पहुँच जाओ। गली के मोड़ पे चाय की दुकान थी जो रात तक exam की तैयारी कर रहे युवाओं के लिए खुली रहती है। मैंने भी उसी दुकान की काली प्लास्टिक से ढकी छत के नीचे सहारा लिया बरिश से बचने के लीये । वेसे मुझे बस स्टैंड तक तो ही तो  जाना  था। इधर उधर नज़र घुमाई पर बारिश में ऑफिस जाने वाला कोई और नज़र नही आया ।

एक  गहरी  लम्बी साँस लेकर मैंने अपने आप को तैयार किया कि भाग कर बस स्टैंड तक पहुँच जाऊ तभी कोई उस काली प्लास्टिक के नीचे आकर मेरे बगल में खड़ा हुआ । देखा तो मेरी तरह आधी भीगी वही शख्स था जिसे  कई बार मेने मेरी गली के बाहर या बस स्टॉप पे पहले भी देखा था। मैं थोड़ा nervous सा फील कर रहा था  क्योंकि पहली बार वो एकदम मेरे सामने आ कर खड़ी हो गई ।ऐसा लगने लगा  जेसे air is पिंक स्काई  is blue और भी वेसे जेसे हम फिल्मो मे देखते है ना same वेसा ही। जेसे हवा ज़ोर से चली और प्लास्टिक का सारा पानी उसके ऊपर जाकर गिरा। हम दोनो ने अपनी आंखें बंद कर ली। आंख खोलने के बाद हम दोनों ने एक दूसरे को देख कर मुस्कुराया और फिर उसने अपने हाथ में रखा छाता मुझे देकर सामने वाली बिल्डिंग में चली  गईं । इससे पहले की में कुछ बोल पाता वो जा चुकी थी ।

आज भी वो छाता मेरे पास है। अमानत है वो किसी की । फिर, वो छाता कभी इस्तेमाल नही किया। चाय की वो दुकान आज भी वही है, पता नही कितनी कहानियां उस दुकान पे बनी। मैंने उस दुकान पर अक्सर  चाय पी और उस दुकान को हमेशा याद किया।  जब कभी बारिश आती है तो घर के कोने में पड़े उस छाते को एक नज़र देख लेता हूं। काश कोई वो छाता लेने फिर से आये। काश वो चाय वाला इश्क़ फिर से महक उठे ।

 चाय में मिला के कुछ पल चाहत के...
आ तुझे घूंट घूंट में मेरा एहसास करा दूं...।।।

लेखक - ललित शर्मा, प्रतापगढ़
rainy season and tea

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