"मृत्युभोज" यह एक सामाजिक अभिशाप - Apna Pratapgarh

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Friday, June 12, 2020

"मृत्युभोज" यह एक सामाजिक अभिशाप

मृत्युभोज

मातम छा जाता उस घर में, आँसू रुक ना पाते है।
चाहे गरीब या अमीर हो, मौत के दर सब जाते है।।
शोक संवेदनाएं जिन्दा, रहती है बस बारह दिन।
तेरहवीं पर सब समाज मिल कर, मृत्यभोज को खाते है।।

कोई दीपक बुझ गया, या राखी का तार टुटा।
सर से साया हटा किसी का, और किसीका सिंदूर मिटा।।
सारी उम्र कमा-कमा कर, तिनका तिनका जोड़ा सका।
इस सामाजिक कुरीति ने उस गरीब को बहुत लूटा। 

खेती-बाड़ी, घर,जेवर,और खुद भी बिक जाता है।
लोक लाज के खातिर फिर भी, सबको बुलाता है।।
हाथ झटक कर चल देते है, सारे रिश्ते और नाते।
उसको पता है केवल वो कैसे, मृतक भोज कर पाता है।।

हे सामाजिक मनीषियों, कुछ तो नव संधान करो।
डूबता जा रहा समाज, कोई तो इसपे ध्यान धरो।।
चिंगारी एक ऐसी जलाओ, अभिशाप दूर कर जाए।
उठो क्रांतिकारी वीरो, इस मृत्युभोज को बंद करो।।

कमलेश शर्मा "कवि कमल" (अध्यापक)
मु. पो.-अरनोद, जिला:-प्रतापगढ़ (राज.)
मो.9691921612

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