कविता - जाने दो - Apna Pratapgarh

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Monday, May 18, 2020

कविता - जाने दो

जाने दो, अब मुझे घर जाने दो ।
जीते रहें , तुझे जीलाते रहें ।।
धूप में श्रम कर , तेरा घर बनाते रहें ।
अंधेरे में यूँ दिन बिताते रहें , कि तेरा घर जगमगाता रहे ।।
जाने दो, अब मुझे घर जाने दो ।

ठीक रहा तो फिर लौटुंगा , तेरा शहर बसाने को ।
घर में बूढी माँ - बाप, जो नैन सजाये बैठे हैं ।।
राह निहारते इधर - उधर जो अपने घर  बैठे हैं ।
जाने दो, अब मुझे घर जाने दो ।

मेरी मिट्टी मेरी माँ  जिसने मुझे किया है याद ।
उस मिट्टी का सुगंध मन मेरे जो छाया ।।
उस मिट्टी का  है कर्ज चुकाना , जिसने मुझे समर्थ बनाया ।
जाने दो, अब मुझे घर जाने दो।

अपनी मिट्टी - संग फिर अच्छे हो जायेंगे ।
अपनों  के संग जो जीवन  बितायेंगे ।।
सब हैं वहाँ अपने लोग , घर वहीं बसायेंगे ।
जाने दो, अब मुझे घर जाने दो।।

तेरा क्या है , अच्छे में अच्छाई दिखाओगे ।
अब  क्या खाक मदद  कर पाओगे ।।
अपने घर जो चल जायेंगे, गुजर - बसर हम कर पायेंगे ।
जाने दो अब मुझे घर जाने दो।


कवि - संगीत कुमार
जबलपुर 

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