Pratapgarh History - Apna Pratapgarh

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Friday, May 22, 2020

Pratapgarh History

प्रतापगढ़ का इतिहास काफी प्राचीन है , इस क्षेत्र पर भील प्रमुख का शासन था , उनके बाद अन्य शासकों ने शासन किया।

पंडित गौरीशंकर हीराचंद ओझा (1863–1947) के अनुसार "प्रतापगढ़ का सूर्यवंशीय राजपूत राजपरिवार मेवाड़ के गुहिल वंश की सिसोदिया शाखा से सम्बद्ध रहा है".

महाराणा कुम्भा (1433 -1468 ईस्वी) चित्तौडगढ़ और महाराणा प्रताप भी इसी वंश के प्रतापी शासक थे, कहा जाता है कि उनके चचेरे भाई क्षेम सिंह/क्षेमकर्ण से उनका संपत्ति संबंधी कोई पारिवारिक विवाद कुछ इतना बढ़ा कि नाराज़ महाराणा कुम्भा ने उन्हें अपने राज्य चित्तौडगढ़ से ही निर्वासित कर दिया। कुछ का मानना है कि भाई-भाई में तलवारें न खिंचें, इसलिए क्षेमकर्ण स्वयं घरेलू-युद्ध टालने की गरज से चित्तौडगढ़ को अलविदा कह आये।

क्षेमकर्ण ने सन 1437 ईस्वी में मेवाड़ के दक्षिणी भूभाग, देवलिया आदि गांवों को तलवार के बल पर 'जीत कर' अपना नया राज्य स्थापित किया। देवगढ़ पर भीलराजाओ का शासन रहा । यहाँ देवलिया में आज भी एक पुराना राजमहल, भूतपूर्व-राजघराने के स्मारक (छतरियां), तालाब, बावड़ियाँ, मंदिर और कई अन्य ऐतिहासिक अवशेष विद्यमान हैं। देवगढ़ में ही मातृशक्ति के एक रूप 'बीजमाता' का एक पुराना मंदिर तो है ही, जैनियों का भगवान मल्लिनाथ मंदिर और राम-दरबार मंदिर (रघुनाथद्वारा) भी हैं, जहाँ राम और लक्ष्मण को मूर्तिकार ने बड़ी-बड़ी राजस्थानी मूंछों में दिखाया है। इसी मंदिर की छत पर सूर्य के प्रकाश की सहायता से समय बताने वाली संगमरमर की धूप घड़ी भी है।
devgarh fort pratapgarh

शासकों का वंश-वृक्ष

क्षेमकर्ण (1437-1473) - क्षेमकर्ण ने मेवाड़ के दक्षिणी भूभाग, देवलिया आदि गांवों को तलवार के बल पर जीत कर' अपना नया राज्य स्थापित किया।

सूरजमल (1473-1530) - देवगढ़ ग्राम में अपना स्थाई ठिकाना बनाते हुए 'नए राज्य' का विस्तार किया।

बाघ सिंह (1530-1535) , राय सिंह (1535-1552) , विक्रम सिंह (1552-1563), तेज सिंह (1563-1593)
भानु सिंह (1593-1597), सिंहा (1597-1628), जसवंत सिंह (1628), हरि सिंह (1628-1673)

महारावत प्रताप सिंह (1673-1708) -  'प्रतापगढ़' नगर बसाया।
pratapgarh fort

पृथ्वी सिंह (1708-1718) - शाही फरमान द्वारा शाह आलम (प्रथम) ने "बसाड के परगने की आय के अलावा अपनी प्रजा के लिए खुद अपने सिक्के ढाल सकने का अधिकार" दिया था।

संग्राम सिंह (1718-1719), उम्मेद सिंह (1719-1721)

गोपाल सिंह (1721-1756) -गोपाल सिंह के शासन-काल में मराठे हर तरफ़ सर उठाने लगे थे, गोपाल सिंह ने मेवाड से अपने अच्छे संबंधों के चलते उदयपुर के महाराणा से न केवल धरियावद परगने का शासन प्राप्त किया था, बल्कि वह मराठों की लूट से भी अपने राज्य को बहुत कुछ महफूज़ रख सके थे।

सालिम सिंह (1756-1774) -  जिन्होंने प्रतापगढ़ के पास 'सालमगढ' बसाया था । मुग़ल-शासक शाह आलम द्वितीय से अपने राज्य के लिए नए 'सालिमशाही सिक्के' प्रचलित करने की लिखित स्वीकृति का नवीनीकरण करवाया, जो 'प्रतापगढ़' की स्थानीय-टकसाल में ही ढाले जाने वाले थे। मल्हारराव होल्कर ने उदयपुर जाते समय सालिम सिंह से सालिमशाही रुपयों की वसूली की थी। सालिम सिंह ने अपने शहर की सुरक्षा के लिए चारों ओर एक परकोटा भी निर्मित करवाया था, जिसके दो छोटे द्वार- 'तालाब बारी' और 'किला बारी' और 6 बड़े प्रवेश द्वार 'सूरजपोल', 'भाटपुरा बारी', 'देवलिया दरवाज़ा' और 'धमोत्तर दरवाजा' थे। सूरज डूबने के साथ ही ये सब नगर-द्वार बंद कर दिए जाते थे, बाहर से आने वालों को सूर्योदय तक शहर के बाहर ही रात बितानी पड़ती थी।
दरवाजा pratapgarh

सामंत सिंह (1774-1844) - मराठों के आतंक के कारण अंग्रेजों से संधि की और जो वसूली मराठा किया करते थे, वही राशि अंग्रेजों को दिए जाने का करार किया।

दीप सिंह - शासनकाल में विद्रोह की घटनाएं हुई जिसके कारण दीप सिंह ने विद्रोहियों की हत्या करवा दी। अग्रेजो को दीप सिंह की यह कार्यवाही नागवार गुज़री और उन्होंने दीप सिंह को प्रतापगढ़ से निष्कासित करते हुए उसे देवगढ़ चले जाने और वहीं रहने का हुक्म दे डाला।  कुछ वक्त तक तो देवगढ़ में दीप सिंह लगभग नज़रबंद रहा, पर अंग्रेज़ी राज का हुकुम टालते हुए वह थोड़े ही वक्त बाद प्रतापगढ़ लौट आया।  अंग्रेज़ी राज को ये सहन न हुवा लिहाज़ा अंग्रेजो की फौज एक टुकड़ी ने आमने-सामने की एक लड़ाई में दीपसिंह को हरा कर बंदी बना लिया और अरनोद के पास अचनेरा-किले में भेज दिया, जहाँ एक कैदी के रूप में इस राजा ने अंतिम साँस (1826) ली।

दीप सिंह के जीवन के पन्ने राजनैतिक-ऊहापोह और उथल-पुथल की घटनाओं से भरे हुये है, उसकी प्रसिद्धि प्रतापगढ़ शहर में बनवाए गए दीपेश्वर मंदिर और दीपेश्वर तालाब के निर्माता होने की वजह से आज भी है।

दलपत सिंह (1844-1864) - खुद दलपत सिंह डूंगरपुर राजा के गोद चले गए, जिन्होंने अंग्रेज़ी हुकूमत के निर्णय के आलोक में अपने दत्तक पुत्र उदय सिंह को तो अपनी जगह डूंगरपुर महारावल घोषित किया और खुद प्रतापगढ़ के राजा बने।

उदय सिंह (1864-1890) - इन्हें डूंगरपुर महारावल घोषित किया गया। कई सुधार किए - दीवानी अदालतें कायम कीं , कुछ कर माफ किये गए , उचित मूल्य की सरकारी दुकानें खोलीं,  'छप्पनिया-काल' के दौरान प्रजा के लिए राहत कार्य शुरू किये, आयुर्वेदिक डिस्पेंसरी खोली,  मुफ्त आदिवासी शिक्षार्थ पाठशालाएं,  'बंदोबस्त महकमे' का गठन, दो अनुभवी हाकिमों के अलावा बंदोबस्त के नए महकमे में सदर-मुंसरिम, पटवारी, बंदोबस्त-अमीन नियुक्त किये गए। पहले-पहल साकथली, हथूनिया और मगरा गांवों समेत 114  गांवों का बंदोबस्त किया गया था। प्रतापगढ़ में अपने लिए कुछ ब्रिटिश तर्ज़ पर एक अलग महल भी बनवाया और राज्य में प्रशासनिक सुधारों पर गंभीरता से ध्यान केंद्रित किया। और अंग्रेजों की कृपा से डाक व तार विभाग अस्तित्व में आया।

रघुनाथ सिंह (1890-1929)  - चूंकि उदय सिंह स्वयं का कोई पुत्र न था, उनकी विधवा रानी ने अपने पति के चचेरे भाई (अरनोद ठिकाने के) रघुनाथ सिंह को गोद ले लिया, जिन्हें अंग्रेजी शासन ने दिवंगत उदय सिंह का उत्तराधिकारी स्वीकार कर लिया। इनके समय में  'सदर अस्पताल' बना, चुंगी-महकमे के अलावा, कुछ एक डाकघर भी खुले और सबसे उपयोगी निर्माण कार्य- ग्राम राजपुरिया से होते हुए एक पक्का सड़क मार्ग, प्रतापगढ़ से मंदसौर बनाया गया,  'डिस्ट्रिक्ट-पुलिस-कप्तान' (एस पी) का नया पद बनाया गया । स्टेट पुलिस-महकमे का पुनर्गठन हुआ और 'खालसा गांवों' में भी भू-प्रबंध लागू किया गया। रघुनाथ सिंह के कार्यकाल में शाशाही-टकसाल बंद कर दी गयी, क्योंकि 'सालिमशाही' सिक्के की बजाय अंग्रेज़ी-मुद्रा को ही प्रतापगढ़ राज्य में 'राज्य-मुद्रा' के रूप में स्वीकार कर लिया गया।
(सर) रामसिंह (1929-1940) - उनके शासन काल में शिक्षा, चिकित्सा, स्थानीय शासन अदि कई क्षेत्रों में काम हुआ।  ग्राम पंचायतों का गठन किया गया और नगरपालिका, प्रतापगढ़ में नामांकित सदस्यों के अलावा चुन कर कुछ निर्वाचित मेम्बर भी आने लगे. सबसे उल्लेखनीय बात थी - प्रतापगढ़ में 1938  में हाईकोर्ट की स्थापना। राम सिंह को अंग्रेजों ने 'सर' की उपाधि भी दी थी।

अम्बिकाप्रसाद सिंह (1940-1948)

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